बरकाकाना क्षेत्र के पोचरा में लड़कियों को निशुल्क ट्रेनिंग दे रहे हैं बसंत नायक

रिपोर्ट – रघुनंदन 

रामगढ़: ये फूल मुझे कोई विरासत में मिले हैं ? शायद तुमने मेरा कांटों भरा बिस्तर नहीं देखा !..झारखंड के कथित रहनुमाओं को भविष्य में कुछ ऐसा ही जवाब राज्य के बेटे-बेटियों से सुनने को मिल जाए तो अचरज की बात नहीं होगी। सुविधाओं और संसाधनों की कमी से प्रतिभाशाली गरीब खिलाड़ियों के टूटते-बिखरते सपने गाहे-बगाहे प्रकाश में आते रहते हैं। जबकि हालात शायद इससे कहीं ज्यादा बदतर हैं। खेल में सपने संजोती झारखंड की शान हमारी बेटियां यदि पोषण तक के लिए जूझ रही हों, तो सिस्टम के लिए इससे शर्मनाक और भला क्या हो सकता है।

बरकाकाना क्षेत्र के पोचरा में यंग जेनरेशन स्पोर्ट्स क्लब की कई किशोरियां सुबह-शाम नियमित रूप से वॉलीबॉल की प्रैक्टिस करती दिखती हैं। खास बात यह है कि इन लड़कियों से ही रामगढ़ जिला वॉलीबॉल गर्ल्स टीम का अस्तित्व है। यहां प्रशिक्षण ले रही नैना कुमारी, सीमा कुमारी, तनीशा कुमारी, निशि कुमारी, रिया कुमारी, रश्मि कुमारी, नेहा कुमारी और अर्पिता कुमारी राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिता में भाग ले चुकी हैं। जबकि निशि कुमारी और रिया कुमारी ने इंटरनेशनल ट्रायल तक का फासला भी तय किया है। समूह में ज्यादातर बच्चियां अनुसूचित जाति और जनजाति से हैं। सरकारी स्कूलों में पढ़ती हैं और बेहद ही निर्धन परिवार से हैं। अधिकांश बच्चों के माता-पिता दिहाड़ी मजदूर हैं और बमुश्किल जीविकोपार्जन भर कमा पाते हैं। बच्चियों के पास सिर्फ हौसले की पूंजी है और मेहनत से जीवन संवारने का ज़ज्बा है। 

कोच बसंत नायक लंबे समय से बच्चियों को‌ न सिर्फ मुफ्त ट्रेनिंग दे रहे हैं, बल्कि हर संभव संसाधन और सुविधा भी मुहैया कराते हैं। जीवन की भाग-दौड़ के बीच सीसीएल कर्मी बसंत नायक का समर्पण और बच्चियों के लिए उनका संघर्ष शब्दों में बयां करना थोड़ा मुश्किल है। बसंत नायक बताते हैं कि यहां तकरीबन 20-21 बच्चियां ट्रेनिंग ले रही है। सभी बहुत मेहनती और अनुशासित हैं। पूरी एकाग्रता से खेल की बारिकियों को सीखती हैं। पूरे आत्मविश्वास से संघर्ष करती है और खुद को बेहतर साबित करने का पुरजोर प्रयास भी करती हैं।

वे कहते हैं कि मैंने भी अपनी तरफ से कोई कोर-कसर बाकी नहीं छोड़ी है। लेकिन कुछ टेक्निकल चीजें हैं जो इनकी सफलताओं के आड़े आ रही हैं। उन्होंने बताया कि “मैट” उपलब्ध नहीं है और ठोस जमीन पर ही प्रैक्टिस करनी पड़ती है। इससे खेल की महत्वपूर्ण बारिकियों को सिखाना मुश्किल हो रहा है। इसका प्रभाव बच्चियों के प्रदर्शन पर भी पड़ता है। इसके लिए प्रशासनिक स्तर पर भी बात रखी गई, लेकिन अबतक कोई पहल नहीं हो सकी।

बसंत नायक बताते हैं कि वॉलीबॉल में खिलाड़ियों का दमखम और स्टेमिना के साथ लंबाई भी काफी मायने रखता है। जबकि अधिकांश बच्चियों को पर्याप्त पोषक आहार नहीं मिल पाता है। यहां अधिकांश बच्चियों के परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद दयनीय है। बसंत नायक ने बताया कि वे किसी तरह बच्चियों के लिए हर माह 30 से 40 किलोग्राम चने और गुड़ की व्यवस्था भर कर पाते हैं। इसमें परिचित लोगों का सहयोग भी शामिल होता है। बसंत नायक कहते हैं कि सहयोग के हाथ और भी बढ़ें तो निश्चित रूप से ये बच्चियां देश, राज्य और जिले के लोगों को अपनी सफलताओं से और भी गौरवान्वित करेंगी। 

सामाजिक संस्था केयर ग्रामीण विकास केंद्र के सचिव कुंदन गोप कहते हैं कि सरकार और प्रशासन को प्रतिभाशाली खिलाड़ियों को संसाधन मुहैया जरूर कराना चाहिए। खिलाड़ियों की सफलता पर हर्ष जताने से बेहतर है कि संघर्ष में उनके सहयोगी भी बनें। राज्य की बच्चियों को पोषण तक नहीं मिल पाना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। इस दिशा में व्यापक रूप से पहल होनी चाहिए। 

 

 

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