रामगढ़: मकर संक्रांति पर तिल-गुड़ खाने की परंपरा वर्षों से चली आ रही है। माना जाता है सर्दियों में तिल और गुड़ का मेल न सिर्फ शरीर को गर्म और ऊर्जावान बनाता है, बल्कि इससे शरीर को जरूरी पोषक तत्व भी प्राप्त होते हैं। इन दिनों भुरकुंडा सहित आसपास के इलाके में जगह-जगह डब्बा बंद तिलकुट बिक रहे हैं। बावजूद इसके ताजे और खस्ता तिलकुट के कद्रदानों की भी कमी नहीं है।
तिलकुट के सीजनली कारोबार से जुड़े सौंदा ‘डी’ के भरत साव बीते सात वर्षों से तिलकुट बना रहे हैं और कोयलांचल की फ़िज़ा में तिल की सोंधी महक और चीनी-गुड़ की मिठास घोल रहे हैं। सौंदा ‘डी’ बाजार में सुबह से शाम तक तिलकुट बनाने का काम चल रहा है, जो मकर संक्रांति तक जारी रहेगा। यहां ग्राहक मोल-भाव करते और तिलकुट चखकर खरीदारी करते देखे जा रहे हैं। भरत साव बताते हैं कि एक माह तक तिलकुट का कारोबार चलता है। 14 दिसंबर से लेकर 14 जनवरी तक किराये की दुकान में तिलकुट बनाते हैं। भुरकुंडा कोयलांचल के अलावा पतरातू, रामगढ़, घुटूवा, सयाल, उरीमारी सहित दूर दराज से लोग आते हैं। खुदरा के साथ थोक बिक्री भी करते हैं।
भरत साव आगे बताते हैं कि इस सीजन में खोआ तिलकुट 400 रुपये, गुड़ तिलकुट 240 रुपये, चीनी तिलकुट 230 रुपये, तिल पापड़ी 260 रूपए प्रति किलोग्राम बिक रहा है। पिछले तीन वर्षों से लगभग यही रेट चल रहा है। जबकि हर सीजन की तरह इस बार भी गुड़ का बना तिलकुट ज्यादा बिक रहा है। उन्होंने बताया कि वे और तीन कारीगर काम में लगे हुए हैं। सुबह चार बजे से तिलकुट बनाने का काम शुरू हो जाता है और रात आठ बजे तक दुकान खुली रहती है। बताते हैं कि एक सीजन में सारा खर्च निकालने के बाद 50 से 60 हजार की कमाई हो जाती है।
वहीं कोयलांचल में तिलकुट के कारोबार को लेकर जानकार बताते हैं कि 80 के दशक में तिलकुट 10 से 12 रुपये प्रति किलोग्राम बिकता था। मजदूरी और तिल-गुड़ के बढ़ती कीमत से व्यवसाय में चुनौतियां और जोखिम भी बढ़ गई है। अब अधिकतर दुकान गया और अन्य जगहों से रेडिमेड तिलकुट लाकर बेच रहे हैं। हालांकि नजर के सामने बनते ताजा तिलकुट गुणवत्ता, स्वच्छता और स्वाद के लिहाज से उम्दा माने जाते हैं।
