37 स्पेशल एजुकेटर्स हुए शामिल
रांची: बौद्धिक दिव्यांगता से ग्रस्त बच्चों की पहचान, मूल्यांकन और दिव्यांगता प्रमाणपत्र बनवाने की प्रक्रिया को लेकर गुरुवार को रांची स्थित रांची इंस्टीट्यूट ऑफ न्यूरो-साइकियाट्री एंड एलाइड साइंसेज (RINPAS) में कार्यशाला आयोजित की गई। इसमें रांची और खूंटी जिले के सरकारी स्कूलों में कार्यरत 37 स्पेशल एजुकेटर्स, प्रोजेक्ट स्टाफ और स्वयंसेवकों ने हिस्सा लिया।

RINPAS के क्लिनिकल साइकोलॉजी विभाग की ओर से ICSSR मेजर प्रोजेक्ट 39/2025 के सहयोग से जेई धुनजीभॉय एकेडमिक एंड रिसर्च सेंटर में यह कार्यशाला-सह-क्षमता विकास कार्यक्रम आयोजित किया गया। इसमें झारखंड सरकार के स्कूली शिक्षा एवं साक्षरता विभाग की ओर से नामित विशेष शिक्षकों को बौद्धिक दिव्यांगता के प्रमाणन से जुड़ी प्रक्रियाओं की जानकारी दी गई।
कार्यक्रम का उद्घाटन RINPAS की निदेशक डॉ. जयती सिमलाई, क्लिनिकल साइकोलॉजी विभागाध्यक्ष प्रो. (डॉ.) अमूल रंजन सिंह और विभाग की एडिशनल प्रोफेसर एवं परियोजना निदेशक डॉ. मसरूर जहां ने किया। उद्घाटन संबोधन में डॉ. सिमलाई ने बौद्धिक दिव्यांगता की शुरुआती पहचान और जरूरतमंद बच्चों को समय पर विशेषज्ञ संस्थानों तक पहुंचाने की आवश्यकता पर जोर दिया।

कार्यशाला में दिव्यांगता प्रमाणपत्र के लिए पात्रता, मूल्यांकन की प्रक्रिया और जरूरी दस्तावेजों की जानकारी दी गई। प्रो. (डॉ.) अमूल रंजन सिंह ने इन विषयों पर संवादात्मक सत्र लिया। वहीं, डॉ. मसरूर जहां ने दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम, 2016 और वर्ष 2024 में निर्धारित परिभाषाओं एवं मानदंडों की जानकारी साझा की।

नेशनल ट्रस्ट, दीपशिखा रांची की क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट एवं स्टेट कोऑर्डिनेटर डॉ. अनुराधा वत्स ने बौद्धिक दिव्यांगता से प्रभावित लोगों के लिए उपलब्ध सरकारी योजनाओं और उनके अधिकारों पर प्रकाश डाला। इसके अलावा विशेष शिक्षकों के अनुभवों के आधार पर दिव्यांगता की पहचान में आने वाली चुनौतियों और सहायता प्राप्त करने के रास्तों पर भी चर्चा हुई।
कार्यक्रम का समापन प्रश्नोत्तर सत्र के साथ हुआ। इसमें प्रतिभागियों की शंकाओं का समाधान किया गया। अंत में सभी प्रतिभागियों को प्रमाणपत्र प्रदान किए गए।

