नन्हे हाथों की मेहनत…मिट्टी की सोंधी खुशबू…घरौंदे में आज भी बसती है मासूमों की खुशियां

रघुनंदन 

रामगढ़: दीपावली का त्योहार आते ही हर घर में खुशियों की रौनक छा जाती है। कहीं रंग-बिरंगी रोशनी से घर सजते हैं और माता लक्ष्मी के स्वागत की तैयारियां होती हैं। लेकिन इन सबके बीच बच्चों के लिए दीपावली का एक अलग ही आकर्षण होता है। उनके लिए यह त्योहार सिर्फ पटाखों, मिठाइयों और नए कपड़ों तक सीमित नहीं, बल्कि अपनी कल्पनाओं को आकार देने और छोटी-छोटी खुशियों को जीने का भी अवसर होता है।

इसी बचपन की खूबसूरत तस्वीर के रूप इन दिनों घरौंदा बनाने की परंपरा में देखने को मिली। मिट्टी से सने नन्हे हाथ, चेहरे पर उत्साह और आंखों में अपने छोटे से आशियाने को खूबसूरत बनाने का सपना… बच्चे पूरे मनोयोग से घरौंदा बनाने में जुटे हैं। कोई मिट्टी गूंथ रहा है, तो कोई दीवारों को आकार दे रहा है। कोई घरौंदे की छत संवार रहा है, तो कोई उसे सजाने की कल्पना में खोया है। आज दिपावली पर जगमगाते दीप इन घरौंदों को रौशन करेंगे। 

इन बच्चों के लिए मिट्टी का यह छोटा सा घर महज एक खिलौना नहीं, बल्कि उनके सपनों का पहला आशियाना है। इसमें वे अपने आने वाले कल की खुशियां देखते हैं। शायद उन्हें अभी यह भी नहीं मालूम कि जीवन में घर बनाने के लिए कितनी मेहनत करनी पड़ती है, लेकिन अपने नन्हे हाथों से मिट्टी का घरौंदा बनाते हुए वे अपने सपनों की नींव जरूर रख रहे हैं।

आज जब आधुनिकता की चकाचौंध में बचपन मोबाइल और वीडियो गेम की दुनिया में सिमटता जा रहा है, ऐसे में मिट्टी से घरौंदा बनाने की यह परंपरा बचपन की सादगी और भारतीय संस्कृति की खूबसूरती को जीवंत कर रही है। इस परंपरा में बच्चों को केवल खेलने का आनंद ही नहीं मिलता, बल्कि आपसी सहयोग, मेहनत और अपनी संस्कृति से जुड़ने का अवसर भी मिलता है।

दीपावली पर घरौंदा बनाने की यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि खुशियां हमेशा बड़ी चीजों में नहीं होतीं। कभी मुट्ठी भर मिट्टी में भी पूरा संसार बस जाता है। इन नौनिहालों के लिए यही मिट्टी का घरौंदा सबसे बड़ा महल है, जिसकी हर दीवार में मेहनत, हर कोने में कल्पना और हर हिस्से में बचपन की मासूमियत छिपी है।

सचमुच, दीपावली की असली रोशनी सिर्फ दीपों में नहीं, बल्कि उन नन्हीं आंखों में भी चमकती है, जो मिट्टी के छोटे से घरौंदे में अपने बड़े-बड़े सपने सजाती हैं।