रांची: राजधानी रांची के मोरहाबादी मैदान में रविवार को आदिवासी एकता महाजुटान रैली के दौरान आदिवासी अधिकारों और संभावित परिसीमन को लेकर व्यापक चर्चा हुई। झारखंड के अलग-अलग जिलों से हजारों की संख्या में लोग इसमें शामिल हुए। इस दौरान आदिवासी समुदायों के लोग अपनी पारंपरिक और रंग-बिरंगी वेशभूषा में पहुंचे। जिससे पूरा मैदान आदिवासी संस्कृति और एकजुटता के रंग में नजर आया। महाजुटान की शुरुआत अमर शहीदों को श्रद्धांजलि देकर की गई। मंच पर मौजूद नेताओं और समाज के लोगों ने शहीदों की तस्वीरों पर पुष्प अर्पित कर उन्हें नमन किया। वक्ताओं ने कहा कि झारखंड की पहचान और अधिकारों के लिए पूर्वजों ने लंबा संघर्ष किया है। उनके बलिदान को याद रखते हुए आगे की लड़ाई को मजबूत करना जरूरी है।

बंधु तिर्की ने परिसीमन को बताया अधिकारों से जुड़ा सवाल
महाजुटान की अगुवाई कर रहे पूर्व मंत्री सह कांग्रेस नेता बंधु तिर्की ने कहा कि परिसीमन को महज सीटों के पुनर्गठन के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसका सीधा संबंध आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व और संवैधानिक अधिकारों से है। उन्होंने कहा कि आदिवासी क्षेत्रों और आरक्षित सीटों की राजनीतिक हिस्सेदारी कमजोर करने का कोई भी प्रयास स्वीकार नहीं किया जाएगा। उन्होंने भाजपा और आरएसएस पर झारखंड की पहचान और आदिवासी हितों को प्रभावित करने का आरोप लगाया। जल, जंगल और जमीन, विस्थापन, पलायन और आदिवासी आबादी में गिरावट जैसे मुद्दों को भी उन्होंने गंभीर चिंता का विषय बताया। साथ ही खनिज संसाधनों और केंद्र से राज्य के बकाये का मुद्दा उठाते हुए आंदोलन को आगे बढ़ाने की बात कही।

परिसीमन पर तैयार रिपोर्ट मंच से हुई पेश
कार्यक्रम के दौरान परिसीमन को लेकर तैयार की गई रिपोर्ट भी सामने रखी गई। हाईकोर्ट के अधिवक्ता सुशीष सोरेन ने मंच पर रिपोर्ट प्रस्तुत की। इसके बाद उन्हें सम्मानित किया गया। आयोजकों ने बताया कि रिपोर्ट में आदिवासी समाज के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों से जुड़े विषयों को शामिल किया गया है। रिपोर्ट को झारखंड कांग्रेस प्रभारी के. राजू के माध्यम से लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी तक पहुंचाने की बात कही गई। उद्देश्य यह है कि झारखंड में परिसीमन को लेकर आदिवासी समाज की आशंकाओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जा सके।

आरक्षित सीटों को लेकर उठी बड़ी मांग
महाजुटान में मांग रखी गई कि परिसीमन के दौरान वर्तमान ST आरक्षित सीटों में किसी भी तरह की कमी नहीं होनी चाहिए। यदि लोकसभा और विधानसभा की कुल सीटें बढ़ती हैं, तो ST के लिए आरक्षित सीटों की संख्या भी उसी अनुपात में बढ़ाई जाए। इसके साथ ही पांचवीं अनुसूची वाले क्षेत्रों को विशेष महत्व देने, आदिवासी बहुल इलाकों की भौगोलिक और सामाजिक परिस्थितियों को ध्यान में रखने तथा ऐतिहासिक विस्थापन और पलायन को भी परिसीमन के दौरान आधार बनाने की मांग की गई।
सुखदेव भगत ने साझा किया राहुल गांधी का संदेश
लोहरदगा सांसद सुखदेव भगत ने मंच से राहुल गांधी का संदेश पढ़कर सुनाया। संदेश में रांची के कार्यक्रम में शामिल नहीं हो पाने पर खेद जताते हुए आदिवासी समाज के अधिकार, पहचान और सम्मान की लड़ाई में साथ खड़े रहने की बात कही गई। संदेश में संविधान सभा में जयपाल सिंह मुंडा की भूमिका का उल्लेख किया गया। पांचवीं अनुसूची, पेसा और वन अधिकार कानून को आदिवासी अधिकारों की सुरक्षा से जोड़ते हुए स्थानीय लोगों की भागीदारी और सहमति के साथ विकास की आवश्यकता बताई गई। संदेश का समापन “जय जोहार” के साथ हुआ।
सांसद कालीचरण मुंडा ने दिया एकजुटता पर जोर
खूंटी सांसद कालीचरण मुंडा ने कहा कि आदिवासी समाज के पूर्वजों ने देश और अपने अधिकारों के लिए संघर्ष किया था। मौजूदा परिस्थितियों में समाज को उसी एकजुटता के साथ अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना होगा। उन्होंने राजनीतिक प्रतिनिधित्व में किसी भी तरह की कमी का विरोध करने की बात कही।
विक्रांत भूरिया ने आरक्षण को बताया बड़ी ताकत
आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने कहा कि शिक्षा, रोजगार और राजनीति में आदिवासी समाज की भागीदारी बढ़ाने में आरक्षण की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। उन्होंने कहा कि राजनीतिक सीटों में कमी का असर समाज की आवाज पर पड़ेगा। उन्होंने अलग-अलग आदिवासी समुदायों से आपसी विभाजन से बचते हुए एकजुट रहने की अपील की।
शिल्पी नेहा तिर्की ने आंदोलन को आगे ले जाने की बात कही
मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की ने कहा कि परिसीमन आने वाले समय में आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज अपनी राजनीतिक ताकत का फैसला खुद करेगा। 2007 के परिसीमन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि अधिकारों की रक्षा के लिए जागरूकता जरूरी है। उन्होंने महाजुटान से उठी आवाज को सड़क से सदन और सदन से दिल्ली तक ले जाने की बात कही।
राजेश कच्छप ने सीटों में कमी का किया विरोध
खिजरी विधायक राजेश कच्छप ने कहा कि आदिवासी समाज अपने राजनीतिक अधिकारों से पीछे नहीं हटेगा। उन्होंने जनसंख्या के आधार पर आदिवासी आरक्षित सीटों में कमी किए जाने की आशंका जताई। उनका कहना था कि प्रतिनिधित्व मजबूत किए बिना आदिवासी समाज के हितों की प्रभावी रक्षा संभव नहीं है।
सुबोधकांत सहाय ने खनिज संपदा में हिस्सेदारी की बात कही
पूर्व केंद्रीय मंत्री सुबोधकांत सहाय ने कहा कि झारखंड की खनिज संपदा और प्राकृतिक संसाधनों से जुड़े फैसलों में स्थानीय आदिवासी समाज की भागीदारी होनी चाहिए। उन्होंने पेसा और अन्य कानूनी प्रावधानों का हवाला देते हुए अधिकारों की लड़ाई को लंबा संघर्ष बताया।
केशव महतो कमलेश ने संवैधानिक अधिकार बचाने की बात कही
कांग्रेस नेता केशव महतो कमलेश ने झारखंड को संघर्ष और उलगुलान की धरती बताते हुए कहा कि आदिवासी समाज को संविधान से मिले अधिकारों की रक्षा जरूरी है। उन्होंने आरोप लगाया कि राजनीतिक हिस्सेदारी कमजोर करने की किसी भी कोशिश का कांग्रेस विरोध करेगी।
विकास मुंडा ने असम का उदाहरण दिया
तमाड़ विधायक विकास मुंडा ने परिसीमन के संभावित प्रभावों को लेकर चिंता जताई। उन्होंने असम का उदाहरण देते हुए कहा कि वहां परिसीमन के बाद आदिवासी समाज के राजनीतिक प्रतिनिधित्व पर असर पड़ा। झारखंड में ऐसी स्थिति पैदा नहीं हो, इसके लिए अभी से आवाज उठाने की जरूरत है।
पारंपरिक वेशभूषा में पहुंचे धरती आबा के अनुयायी
महाजुटान में पश्चिमी सिंहभूम के विभिन्न क्षेत्रों से भगवान बिरसा मुंडा के अनुयायी भी पहुंचे। देवगांव, बंदगांव, बड़की और बिरबा क्षेत्र से आए बिरसाइयत समाज के लोगों की पारंपरिक वेशभूषा और अलग सामाजिक पहचान लोगों के आकर्षण का केंद्र रही। उन्होंने भी आदिवासी अधिकारों और एकजुटता के संदेश के साथ कार्यक्रम में भागीदारी की।
कार्यक्रम में ये रहे शामिल
महाजुटान में बड़ी संख्या में जनप्रतिनिधि और सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे। इनमें शशि पन्ना, राजेश लिंडा, लक्ष्मी नारायण मुंडा, अजय तिर्की, दयामनी बारला, नमन बिक्सल कोंगाड़ी, भूषण बाड़ा, डॉ. प्रदीप बालमुचु, शिवा कच्छप, देमका सोय, महेश बांदो, ज्योत्सना केरकेट्टा, जोसाय मरांडी, नीरज भोक्ता, चंद्र प्रभात मुंडा, विक्की धान, आशुतोष चेरो, राज किशोर सिंह खेरवार, अनुप लकड़ा, मनोज सोय, रेयानेल सामद, मार्शल बारला और शिवू होरो समेत कई लोग शामिल रहे।
