मांडर के ऐतिहासिक जतरा आखड़ा में पारंपरिक पूजा के साथ महोत्सव का आगाज, कल दिखेगा लोकसंस्कृति और सामुदायिक एकता का रंग

मांडर (रांची): आदिवासी समाज की धार्मिक परंपरा, प्रकृति के प्रति आस्था और पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था की पहचान ऐतिहासिक राजी पड़हा मुड़मा जतरा महोत्सव मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 को मांडर के मुड़मा गांव स्थित जतरा आखड़ा में शुरू हुआ। 40 पड़हा की परंपरा से जुड़े धर्मगुरुओं, पाहन-पुजारियों और पारंपरिक पदाधिकारियों की मौजूदगी ने आयोजन को धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व दिया। विभिन्न जिलों से पहुंचे प्रतिनिधियों और श्रद्धालुओं ने भी इसमें भाग लिया। महोत्सव का मूल संदेश अपनी सांस्कृतिक जड़ों की रक्षा करना, प्रकृति के साथ संबंध मजबूत रखना और पूर्वजों की विरासत को अगली पीढ़ी तक पहुंचाना है।

जतरा के पहले दिन धार्मिक अनुष्ठान और पारंपरिक प्रक्रियाएं प्रमुख रहीं। दोपहर तीन बजे कलश यात्रा निकाली गई। शाम चार बजे 40 पड़हा के पाहन-पुजारियों और पारंपरिक पदाधिकारियों ने ऐतिहासिक जतरा शक्ति खूंटा में विधि-विधान से पूजा-अर्चना की। इसके बाद शाम पांच बजे दीवान, बेल, राजा और पड़हा राजाओं की उपस्थिति में जतरा का विधिवत उद्घाटन हुआ। शाम 5.30 बजे मुख्य मंच पर अतिथियों और विभिन्न क्षेत्रों से आए प्रतिनिधियों का पारंपरिक रीति-रिवाज से स्वागत किया गया।

कार्यक्रम में राजी सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा, स्थानीय विधायक एवं झारखंड सरकार की कृषि एवं पशुपालन मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की, राजी पड़हा सरना प्रार्थना सभा भारत के केंद्रीय महासचिव विद्या सागर केरकेट्टा, आयोजन समिति के अध्यक्ष जगराम उरांव और केंद्रीय प्रवक्ता संजय पाहन शामिल हुए। राजी दीवान झाबुआ उरांव के साथ आदिवासी बचाओ युवा मोर्चा के प्रतिनिधि राहुल तिर्की और संगीता कच्छप तथा सामाजिक कार्यकर्ता एस अली भी मौजूद रहे।

चार जिलों के प्रतिनिधियों की भागीदारी

महोत्सव में झारखंड के विभिन्न क्षेत्रों की पारंपरिक धार्मिक और सामाजिक व्यवस्था से जुड़े प्रतिनिधियों को सम्मानित किया गया। बोकारो जिले के लालपनिया स्थित लुगुबुरु घंटाबाड़ी से लोबिन मुर्मू, उत्सर्जन हंसदा, रॉयल हंसदा और मालती मुर्मू पहुंचे। गिरिडीह के मरांग बुरु से नूनका टुडू, सिकंदर हेम्ब्रम, बुधन हेम्ब्रम और शानू हेम्ब्रम ने भाग लिया।

खूंटी जिले से महादेव मुंडा, सुकू सांगा, सुंदरी तोप, मार्गो सांगा, भावा उरांव, जुबी उरांव, चुमकू उरांव, भरजुन मुंडा और दिलीप उरांव सहित पारंपरिक पदाधिकारी शामिल हुए। गुमला जिले से सुशीला उरांव, पुनई उरांव, मांझी लाल कुजूर, सतीश उरांव, राजू नागेशिया, दीपलाल नागेशिया, तेतरु उरांव, शिशुपाल उरांव, सुदेश उरांव और चामू उरांव ने भागीदारी की।

जतरा के मंच से संस्कृति और प्रकृति संरक्षण को समाज की सामूहिक जिम्मेदारी बताया गया। आयोजकों ने परंपराओं को केवल धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित न रखते हुए उन्हें सामाजिक पहचान और सामुदायिक एकता से जोड़ने का संदेश दिया। ‘जय सरना, जय जोहार’ का उद्घोष इसी सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक रहा।

कल लोकनृत्य और पारंपरिक गीत-संगीत से सजेगा जतरा

आयोजन समिति के मुताबिक, बुधवार, 28 अक्टूबर को महोत्सव के दूसरे दिन स्थानीय और क्षेत्रीय सांस्कृतिक दल पारंपरिक गीत-संगीत तथा ढोल-मांदर की थाप पर लोकनृत्य प्रस्तुत करेंगे। मेले में पारंपरिक कला और सामुदायिक सहभागिता से जुड़े कार्यक्रम आयोजित होंगे। समापन पर अतिथियों, धर्मगुरुओं, पाहन-पुजारियों, जनप्रतिनिधियों, श्रद्धालुओं और स्वयंसेवकों के प्रति आभार व्यक्त किया जाएगा। इसके साथ ही सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को सुरक्षित रखने का संकल्प लिया जाएगा।

आयोजन समिति के अध्यक्ष जगराम उरांव और केंद्रीय प्रवक्ता संजय पाहन ने श्रद्धालुओं तथा आगंतुकों से अनुशासन बनाए रखने, पारस्परिक सम्मान का ध्यान रखने और जतरा की सांस्कृतिक गरिमा कायम रखने की अपील की है।