रामगढ़: सीसीएल की भुरकुंडा कोलियरी के संगम इको अन-फ्रेंडली पार्क से आपकी भी सुनहरी यादें जरूर जुड़ी होंगी…क्या कहा! नहीं जुड़ी हैं ?…अब जुड़े भी तो कैसे…न बनते टाइम लगा न बिगड़ते। तब चर्चा थी कि खर्चा खूब हुआ है, किसने कितना कमाया-बचाया इसकी चर्चा आज भी अविश्वसनीय सूत्र करते रहते हैं। आज भी सीसीएल के तात्कालिक अधिकारियों की विलक्षण प्रतिभा का स्मरण होते ही जानकारों के कर्णभेदी वाक्यांश अनायास प्रस्फुटित हो जाते हैं। पार्क की बदहाली की परिपाटी पहले से ही तय थी या बाद में बर्बादी के दिन शुरू हुए, यह पर्यावरण की चिंता करनेवालों के लिए चिंतन का बड़ा विषय है।

वर्ष 2012-13 में भूमिगत आग से सुलगती संगम बंद क्वायरी खदान पर प्रबंधन ने पार्क की योजना बनाई। पेड़-पौधे लगाकर भूमिगत आग को बढ़ने से रोकने की कवायद शुरू हुई। पार्क को पेवर ब्लॉक और ऑटोमैटिक इरिगेशन सिस्टम से पाट दिया गया। अधिकारियों ने बकायदा नाम के बोर्ड के साथ औषधीय, फलदार और छायादार पेड़ों के पौधे लगाए। साथ में विशेष प्रकार के बांस और 10000 से अधिक पेड़ लगाने की बातें कही गई। तब पार्क के शुभारंभ से ओवर एक्साइटेड तात्कालिक महाप्रबंधक सुमित घोष ने पिकनिक स्पॉट बनाने की घोषणा कर दी। ओबी डंप के दो छोर के बीच गहराई देख उन्होंने रोपवे ट्राली और पानी देख मछली घर की योजना का उद्घोष कर दिया। मौके पर पर्यावरण विभाग, भारत सरकार के वैज्ञानिकों ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया था। दाद देनी चाहिए उनकी दूरदर्शिता की, पार्क वाकई इतिहास बन गया। भुरकुंडा कोयलांचल वासियों का ट्रॉलियों से वादियों को निहारने का दिवास्वप्न अधूरा रह गया। पिकनिक स्पॉट की उम्मीदें दम तोड़ गई। स्थानीय लोगों में रोष है, कहते हैं यहां सब्जियां लगाकर कम से कम “सब्जबाग” तो दिखा देना चाहिए था।

ये इको पार्क इतना अन-फ्रेंडली क्यों है
पार्क में औषधीय, फलदार, छायादार वृक्षों की जगह गांठदार बांस और कुछ घुमावदार पेड़ ही बचे हैं। जहां-तहां नित्यकर्म की निशानियां एक बड़े केंद्रीय अभियान को सुबह-शाम और खुलेआम चैलेंज दे रही हैं। खुले में लोग यहां कुछ ज्यादा ही खुल जा रहे हैं। जहां-तहां पड़ी शराब की बोतलें “अड्डेबाजी” की गवाही और प्रहरियों को चुनौती दे रही हैं। मेन गेट का आधा झूलता हुआ लोहे का पल्ला 10-12 दिन पहले कोई बपौती समझ काट ले गया है। निगरानी के अभाव में निगरानी टावर का दरवाजा भी चौखट समेत उड़ा ले गया है। खिड़की बची है, इसे निबटाने की योजना भी जरूर बन रही होगी। पार्क का सुध लेने वाला कोई नहीं है। प्रबंधन और प्रबुद्ध लोगों की उदासीनता का आलम यह है कि पार्क का अस्तित्व बचाने की एक पहल तक नहीं हो सकी है। पूरे इलाके में इको-पार्क का कोई भी “फ्रेंड” नहीं है। वैसे हाल में ही रामगढ़ के तात्कालिक डीसी फैज अक अहमद मुमताज ने प्रबंधन के आमंत्रण पर बांसगढ़ा भूमिगत खदान का विजिट किया था और कोयला देख खुशी जताई थी। महोदय चूक गए, 10 कदम पर अवस्थित यह पार्क घूम लेते तो ज्यादा कालिख देख पाते।

क्या कहते हैं लोग
पार्क के संदर्भ में स्थानीय लोग बताते हैं कि जिन्होंने पार्क में पेवर ब्लॉक, फौव्वारे और पाइप-लाइन बिछाए थे, वो ही बाद में सब निकाल ले गए। पार्क की रखवाली और देखभाल बिल्कुल भी नहीं की गई। लाखों रुपए खर्च दिखाकर की गई “सार्थक” पहल “निर्रथक” बनकर रह गई। इस प्रकार की बातें लोग पार्क की बदहाली के शुरआती दिनों से ही करते आ रहे हैं। हालांकि ऐसा कहनेवालों को प्रबंधन ने तभी असामाजिक तत्व बता दिया था। यहां “असामाजिक” का तात्पर्य संभवतः वैसे तत्वों से है जो सीसीएल की छत्रछाया में पोषित होते और प्रबंधन के निजी क्रियाकलापों में तांक-झांक करते हैं।
खैर, इंसान गलतियों से ही सीखता है और कभी-कभी तो दोहरा भी देता है। दोहराव बलकुदरा ओबी डंप पर किया जा रहा है। अब पर्यावरण विभाग के वैज्ञानिक विशेषज्ञ ही बेहतर बताएंगे कि यह निर्माणाधीन सात करोड़ी पार्क कितने समय में ऐतिहासिक हो जाएगा। बहराल, अब नाम बदलने का भी एक प्रचलन चल रहा है। तो ऐसे में “काया-कल्प वाटिका” के नाम से उद्घाटित वाटिका को “सीसीएल ईको पार्क” नाम दे दिया गया है। शायद हश्र पता है इसीलिए “फ्रेंडली” शब्द से दूरी बना ली गई है। इस “काया-अल्प वाटिका” पर फिर कभी विशेष बात होगी।

