झारखंड को सदियों तक खलेगी पद्मश्री डॉ. राम दयाल मुंडा की कमी

डॉ. राम दयाल मुंडा के जन्म दिवस पर विशेष

रांची : स्वर्गीय डॉ. राम दयाल मुंडा का नाम जेहन में आते ही झारखंड के सामाजिक और साहित्यिक क्षेत्र में सबसे तेज चमकते प्रकाश पुंज का स्मरण हो उठता है। भाषाविद्, समाजशास्त्री और साहित्यकार से रूप में उनके योगदान झारखंड की बुनियाद में समाहित हैं। हिंदी, अंग्रेज़ी सहित नागपुरी, मुंडारी जनजातिय भाषा में उनकी रचनाएँ कालांतर तक जीवंत रहेंगी। कहना गलत नहीं होगा कि कम से कम झारखंड के परिपेक्ष्य में बहुआयामी डॉ. राम दयाल मुंडा के समकक्ष दूसरा विद्वान साहित्यकार और समाजशास्त्री नहीं है। जनजातिय समाज के उत्थान में उनके प्रयास वंदनीय हैं। आदिवासी लोक कला, गीत-संगीत और नृत्य को मिली वैश्विक पहचान डॉ. राम दयाल मुंडा के लंबे संघर्ष का प्रतिफल है। विश्व आदिवासी दिवस मनाने की परंपरा शुरू करने में उनका अहम योगदान रहा है। विश्व आदिवासी आंदोलन और झारखंड आंदोलन पर उनकी कई पुस्तकें और 50 से ज्यादा निबंध प्रकाशित हैं। इसके अतिरिक्त हिन्दी, संस्कृत, बांग्ला और अंग्रेजी में भी उन्होंने कई पुस्तकों का अनुवाद और संपादन किया है। शिक्षा आजीवन उनका मूल मंत्र रहा और शिक्षित आदिवासी समाज उनके जीवन का उद्देश्य।

संक्षिप्त जीवन परिचय

झारखंड के तमाड़ से कुछ दूर स्थित देवड़ी में डॉ राम दयाल मुंडा का जन्म हुआ। रांची विश्वविद्यालय से मानव विज्ञान में स्नातकोत्तर करने के बाद वे अमेरिका चले गये। वहां भाषा विज्ञान में पीएचडी की। अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में बतौर सहायक प्रोफेसर अध्यापन में योगदान दिया। 1982 में रांची लौट आये। रांची विश्वविद्यालय के तात्कालीन कुलपति कुमार सुरेश सिंह के सहयोग से रांची विश्वविद्यालय में आदिवासी और क्षेत्रीय भाषा विभाग की स्थापना की। वे रांची विश्वविद्यालय के कुलपति भी रहे। 1987 में सोवियत संघ में आयोजित भारत महोत्सव में उन्होंने सांस्कृतिक दल का नेतृत्व किया। 1989 से 1995 तक भारत सरकार की झारखंड विषयक समिति के सदस्य रहे। सात वर्ष तक झारखंड पीपुल्स पार्टी के अध्यक्ष रहे। 2010 में उन्हें पद्मश्री सम्मान से सम्मानित किया गया। इसी वर्ष राज्य सभा सांसद बने। 30 सितंबर को हार्ट अटैक से उनका निधन हो गया।

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