चितरपुर (रामगढ़): एक ओर जहां देश-दुनिया भर में जलस्रोतों को संरक्षित करने की दिशा में निरंतर कवायद चल रही है, वहीं चितरपुर प्रखंड के तालाब और पोखर अतिक्रमण की भेंट चढ़कर अस्तित्व खोते जा रहे हैं। वर्तमान समय में अधिकांश तालाब और पोखरों का दायरा सिमटता जा रहा है और भू-माफिया फर्जी दस्तावेज के सहारे तलाब और पोखरों की जमीन कब्जाने की होड़ में लगे हुए हैं।
चितरपुर प्रखंड में बस स्टैंड के निकट गुहिया तालाब का अस्तित्व भी खतरे में है। जीवनदायी तालाब में कूड़ा-कचरा फेंका जा रहा है। तालाब के किनारों की भराई कर अतिक्रमण के लिए जमीन तैयार की जा रही है। सरेआम व्यवस्था का माखौल उड़ाया जा रहा है। इधर, तालाब पर मंडराते खतरे और अवैध निर्माण को लेकर स्थानीय नागरिकों ने चितरपुर अंचलाधिकारी को ज्ञापन देकर रोक लगाने की मांग की है। जिसपर निर्माण कार्य फिलहाल रुकवा दिया गया है। हालांकि तालाब के अतिक्रमण पर स्थाई रूप से रोक लगेगी, इसके आसार कम ही दिख रहे हैं। प्रशासन को चाहिए कि तालाब के वास्तविक भू-भाग को सार्वजनिक करें और सभी दावों की जांच पड़ताल कर तालाब को संरक्षित करें।
स्थानीय खेदन प्रसाद बताते हैं कि चितरपुर में कई पोखर हैं और लगभग सभी पर भू-माफिया जमीन तैयार कर बेचने का काम कर रहे हैं। स्थानीय लोगों को पोखर तक आने-जाने में भी परेशानी उठानी पड़ रही है। यहां ग्रामीणों के सभी कर्मकांड संपन्न होते। स्नान-ध्यान के अलावा भी दैनिक कार्यों के लिए बड़ी आबादी तालाब और पोखरों पर निर्भर है। वहीं स्थानीय लोग बताते हैं कि कूड़ा-करकट फेंकने से अतिक्रमण की शुरुआत की जाती है और एक समय ऐसा आता है कि मिट्टी भराई कर जमीन तैयार कर दी जाती है। साथ ही नाटकीय ढंग के जमीन के दस्तावेज भी निकल आते हैं। प्रशासन को चाहिए कि तालाब की वास्तविक जमीन को सार्वजनिक कर अतिक्रमण से मुक्त कराए और फर्जीवाड़ा करते लोगों पर कानूनी कार्रवाई भी सुनिश्चित करें।
बहराल, यह सिर्फ एकमात्र गुहिया तालाब की बात नहीं है। जिला अंतर्गत कई अन्य तालाब-पोखरों का भू-माफियाओं द्वारा अस्तित्व मिटाया जा रहा है। अधिकारियों को इसकी भनक नहीं लगती हो यह मुमकिन नहीं है, बावजूद इसके कोई कठोर और साथर्क कदम न उठाया जाना मिलीभगत की ओर भी इशारा कर रहा है। क्षेत्र के आमजनों के साथ-साथ मवेशियों, पशु-पक्षियों और जलीय जीवों के लिए जीवनरेखा ये तालाब और पोखर कल जब नक्शे से गायब हो जाएंगे, शायद तब ही इनकी उपयोगिता समझ आएगी। विडंबना यह है कि “जल है तो कल है” के नारे बुलंद करनेवाले नेता, अधिकारी और कथित प्रबुद्ध लोग तमाशबीन होकर जीवनदायी तालाबों और पोखरों का अस्तित्व मिटता देख रहे हैं।
