भुरकुंडा (रामगढ़): अंकल! ट्यूशन से शाम में घर लौटती हूं… सड़क नहीं है…रास्ते पर अंधेरा पसरा रहता है… परेशानी होती है और डर भी लगता है…यह कहना है भुरकुंडा कोलियरी के ‘3 नंबर कॉलोनी’ की रहनेवाली 10वीं की छात्रा प्रियंका का। 

बांसगढ़ा माइंस से तीन नंबर कॉलोनी की मुख्य सड़क

आपने ‘चिराग तले अंधेरा’ कहावत जरूर सुनी होगी, कभी देखने का मन हो जाए तो भुरकुंडा कोयलांचल के “3 नंबर” चले आईए। भुरकुंडा में प्राचीन बुढ़वा महादेव मंदिर के दुर्गम रास्ते पर सीसीएल की ‘3 नंबर कॉलोनी’ मिलेगी। जो कहीं से भी कॉलोनी नहीं लगेगी, बल्कि राज्य के किसी रिमोट विलेज सा प्रतीत होगा। यहां आपको देश को रौशन करते कोयलांचल का स्याह सच मिलेगा। बिना स्ट्रीट लाइट का जर्जर और लंबा रास्ता मिलेगा। मुहल्ले में रास्ते पर बहती-जमती कच्ची नालियां मिलेंगी, पोखरिया के पानी पर एक हद तक बसर होती जिंदगी मिलेगी। आदिवासी बहुल सैंकड़ों की आबादी मिलेगी और राज्य के सुदूरवर्ती गांव-टोलों जैसे बद्तर हालात मिलेंगे। 

घर के बाहर कच्ची नाली

यहां रास्ते के नाम पर 25 साल से भी अधिक पुराने पिच रोड के निशान मिलते हैं। जो पूर्व विधायक लोकनाथ महतो के कार्यकाल में बनी थी। इसके बाद ‘विकास का पहिया’ विपरीत दिशा में ही दौड़ता रहा है। मुहल्ले तक पहुंच मार्ग पर आज तक रौशनी की व्यवस्था नहीं की जा सकी है। शाम ढलने के साथ ही अंधेरा पसर जाता है। दिहाड़ी मजदूरी कर घर लौटती महिलाओं और ट्यूशन से लौटती बच्चियों को रोजाना बड़ी परेशानी झेलनी पड़ती है। लोग टॉर्च या मोबाइल की रोशनी में आवागमन को विवश दिखते हैं। भुरकुंडा मेन रोड से बांसगढ़ा मांइस होकर तीन नंबर तक जाते मुख्य रास्ते की बरसात के दिनों में दुर्दशा हो जाती है। दुपहिया वाहनों तक का आवागमन दूभर हो जाता है। लोग दूसरी कॉलोनियों की गलियों के वैकल्पिक रास्ते पर आते-जाते दिखते हैं।

सीसीएल बरका-सयाल की हृदय स्थली भुरकुंडा की जगमगाहट के बीच एकांत में निर्जन सा तीन नंबर कॉलोनी मानो दशकों पीछे छूट गया है। यहां रहनेवाले अनुसूचित जनजाति और अनुसूचित जाति के लोग बुनियादी सुविधाओं से अब तक वंचित हैं। चहल-पहल सिर्फ चुनावों के समय ही दिखाई पड़ती है। मालूम पड़ता है कि कुछ राजनीतिक दल इन्हें अपना वोटर नहीं मानते और कुछ दल वोटर के अलावा कुछ नहीं मानते। सीसीएल ने कॉलोनी में बिजली देकर दायित्वों की इतिश्री कर ली है। पंचायती राज में  “तीन’ नंबर कॉलोनी को वार्ड की पहचान तो दे दी गई है, लेकिन कल्याणकारी फंडों का खेल अभी यहां शुरू नहीं हो सका है। बहराल, कंपनियों के लिए 24 घंटे कूदने-फांदने को तैयार जनप्रतिनिधि और प्रशासनिक अधिकारी यहां साफ मन से चहलकदमी भर कर जाते तो शायद यहां भी जनता के अच्छे दिन आ जाते और ‘अबुआ राज’ के हसीन सपने को थोड़े पंख लग जाते। 

आपस में पैसा मिलाकर कॉलोनी में जैसे-तैसै लाइट लगाए हैं। कामकाजी महिलाएं और ट्यूशन से बच्चे शाम के समय लौटते हैं। पूरे रास्ते अंधेरा रहता है, परेशानी होती है। चुनाव के समय नेता शिकायत सुनते हैं और आश्वासन देकर चले जाते हैं। फिर कोई देखने सुनने नहीं आता – रंजीत नायक, स्थानीय 

 

दो-तीन पीढ़ियां यहां गुजर गई, क्षेत्र में सबकुछ बदल गया, लेकिन यहां के हालात जस के तस रह गए। दो-तीन साल पहले झारखंड सरकार का पानी कनेक्शन लगा है। इससे पहले तक यहां के लोग रिवर साइड के बड़ा ऑफिस के पास से रोज पीने का पानी लाते थे। इसके अलावा यहां कुछ नहीं हुआ, समस्या सुनने वाला कोई नहीं है। – राजकुमार, स्थानीय 

 

 

भुरकुंडा के 3 नंबर कॉलोनी का इतिहास काफी पुराना है। संभवतः सीसीएल से भी पहले का। यहां आसपास के जिलों से आकर लोग कभी कोयला खनन के कार्य में लगे थे। सीसीएल ने बाद में यहां कुछ बैरक टाइप क्वार्टरों का निर्माण भी किया। जिसमें खदान में काम करनेवाले मजदूर रहते थे। उस दौरान कई गरीब रोजी-रोटी की तलाश में आए और आसपास अपना बसेरा बसा लिया। आज यहां गिने चुने सीसीएल कर्मी रहते हैं। जबकि यहां के अधिकांश लोग गैर सीसीएल कर्मी हैं और दिहाड़ी मजदूरी करके जीवन बसर कर रहे हैं। बुनियादी व्यवस्था का यहां हमेशा से घोर अभाव रहा है। लेकिन किसी ने सुध लेने की जहमत नहीं उठाई। इलाके में अन्य जगह भी ऐसे हालात हो सकतें हैं, लेकिन बुढ़वा महादेव मंदिर आते-जाते जनप्रतिनिधियों, अधिकारियों, प्रबुद्ध जनों को यहां के हालात कभी नहीं दिखे, यह अचरज की बात है।