रामगढ़: सीसीएल की भुरकुंडा परियोजना में बुधवार को विस्थापितों के दो पक्षों में हुई मारपीट से क्षेत्र के लोग स्तब्ध है। भुरकुंडा में कई तरह की चर्चाएं हो रही हैं, कई कयास भी लगाए जा रहे हैं। राजनीति, साजिश, मनमानी, लापरवाही सरीखे कई शब्द आम चर्चाओं का हिस्सा हैं और कई गंभीर सवालों को जन्म दे रहे हैं। वहीं घटना के बाद अधिकांश विस्थापितों में आवेश की जगह अफसोस है। अफसोस उन पलों का है जब अपने ही अपनों से जोर आजमाइश कर बैठे। कुछ इलाज में लगे हैं, कुछ एक-दूसरे का दर्द बांटने की मशक्कत रहे हैं। हमने स्थानीय प्रबंधन से भी स्थिति जाननी चाही परंतु संपर्क स्थापित नहीं हो सका। इन सबके बीच सबसे बड़ा विरोधाभास यह है कि विस्थापितों के बीच संघर्ष अनायास हुआ या फिर कहीं न कहीं संघर्ष की परिपाटी तैयार हो रही थी। 

लड़ाई… खूनी संघर्ष…उस रोटी के लिए, जिसके असंख्य निवाले दूसरों को बांटकर भी भुरकुंडा क्षेत्र के ग्रामीणों ने हमेशा आलौकिक आनंद की ही अनुभूति की है। पिछले 100 वर्षों से इलाके में हो रहे कोयला खनन में इन्होंने कभी किसी का निवाला नहीं छीना, किसी का हक नहीं मारा। सीसीएल के संसाधनों पर मुफ्तखोरी नहीं की, लोहा-लक्कड़ चुराकर नहीं बेचा, जमीन कब्जा कर दुकान-मकान नहीं जोड़ा। संघर्ष किया भी तो हमेशा संविधान द्वारा प्रदत्त हक और अधिकार की ही बात की।

आज ये ग्रामीण चाह भी रहे तो क्या… आउटसोर्सिंग में काम… मजदूरी… दो वक्त की रोजी-रोटी। बाहें फैलाकर इनका स्वागत करने की बजाय मुफ्तखोरों पर हर माह करोड़ों लुटाना प्रबंधन को मुनाफे का सौदा लगता है। क्षेत्र में नीति-नियमों का होता अनुपालन जगजाहिर है। अपने मजदूरों के जर्जर क्वार्टर की मरम्मती के बजाय बिचौलियों और कथित नेताओं के आशियाने संवारते अधिकारियों से नैतिकता और बौद्धिकता की उम्मीद ही बेमानी है। हालिया समय में सीबीआई के बढ़ते छापे, अपने ही कर्मचारी से घूसखोरी, उजागर हुई अवैध गन फैक्ट्री और अब रोजी-रोटी के लिए खूनी संघर्ष से साफ है कि क्षेत्र अपने पतन के दौर में है। 

कई सवाल खड़े कर गया विस्थापित-ग्रामीणों का खूनी संघर्ष 

विस्थापितों के बीच हुई मारपीट की घटना से कई बड़े सवाल यह उठ रहे है। ग्रामीणों के बीच आपस में संघर्ष की स्थिति क्यों बनी, यह अनायास हुआ या फिर सोच समझकर ऐसे हालात पैदा किए गए, यह कौतुहल का बड़ा विषय बना हुआ है। स्थानीय चर्चाओं में लोग पहले से ही संघर्ष की संभवना जता रहे थे। इधर, चर्चाओं में कुछ आशंकाएं भी छनकर सामने भी आ रही है। भुरकुंडा लोकल सेल को लेकर समन्वय का प्रयास अब तक असफल रहा है। ऐसे में आउटसोर्सिंग कंपनी में रोजगार के लिए पृथक रूप से आंदोलन कर रहे विस्थापितों को एकत्रित करने की आपाधापी क्यों मची, यह जानते हुए भी कि लोकल सेल विवाद में भी यह दोनों गुट भी आमने-सामने है।

वहीं समाधान समिति का गठन करते समय ही नियोजन में हिस्सेदारी का अनुपात और विस्थापित पहचान के मसले पर तथ्यों को स्पष्ट क्यों नहीं कर लिया गया। भुरकुंडा परियोजना कार्यालय में समाधान समिति के गठन के बाद बाहर में विस्थापितों में नोंक-झोंक हुई थी। मामला बढ़कर भुरकुंडा ओपी भी पहुंचा था और जैसे-तैसे शांत हुआ। संघर्ष की प्रबल संभावना के बीच पहले दोनों पक्ष से अलग-अलग बातचीत कर आशंकाओं को समझने की बजाय पुनः दोनों गुटों को एक साथ क्यों बुलाया गया।

इससे पूर्व आउटसोर्सिंग में रोजगार के ही मुद्दे पर आठ समितियों की त्रिपक्षीय वार्ता में बिना समितियों की जानकारी पीसीसी सदस्यों को बुलाकर बेवजह बखेड़ा खड़ा करने की कोशिश क्यों की गई।

मालूम पड़ता है कि प्रबंधन को लॉ एंड ऑर्डर से ज्यादा चिंता खनन में फिलहाल पड़ते व्यवधान की है। विस्थापितों के बीच हुए झड़प में यदि किसी ग्रामीण के साथ अनहोनी हो गई होती तो क्या कथित समाधान समिति उनके परिजनों की जीवनपर्यंत की समस्याओं का समाधान कर पाती ?

बहराल, मुद्दे और मांगें अब भी यथावत हैं, जबकि जाने-अनजाने में संघर्ष की जमीन तैयार कर दी गई है। भविष्य में पता नहीं लहू की कितनी बूंदें यहां की काली धरा को लाल करेगी। शायद अब अधिकारी यहां “लाल कोयला” भी खोदेंगे।

क्षेत्र को अशांत करना चाह रही स्थानीय प्रबंधन : अजय पासवान 

विस्थापितों के बीच हुए लड़ाई-झगड़े पर भुरकुंडा पंचायत के मुखिया अजय पासवान ने प्रतिक्रिया देते हुए कहा है कि लोगों को आपस में उलझाकर लड़वाया गया है। स्थानीय प्रबंधन क्षेत्र को अशांत करना चाह रही है। इससे पूर्व भुरकुंडा लोकल सेल को लेकर भी संघर्ष की स्थिति बना दी गई थी। क्षेत्र में शांति व्यवस्था बनी रहे और लोगों को उनके अधिकार सुनिश्चित मिलें, इसको लेकर जिला प्रशासन को पहल करनी चाहिए। 

 

 

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