The spirit of Karam comes alive at Ranchi University 1 (2)

 

रांची: करम महोत्सव के बहाने मंगलवार को रांची विश्वविद्यालय का डॉ. रामदयाल मुंडा अखड़ा झारखंड की बहुभाषी और बहुरंगी संस्कृति का मंच बन गया। जनजातीय एवं क्षेत्रीय भाषा संकाय के विद्यार्थियों ने नौ भाषाओं में लोकगीत और पारंपरिक प्रस्तुतियां देकर करम पर्व की परंपरा को जीवंत किया। कार्यक्रम में कृषि मंत्री शिल्पी नेहा तिर्की मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुईं।

महोत्सव में मुंडारी, कुड़ुख, संथाली, हो और खड़िया भाषाओं के विद्यार्थियों ने पारंपरिक वाद्ययंत्रों के साथ लोकगीत पेश किए। नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया और कुरमाली के विद्यार्थियों ने भी अपनी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों से कार्यक्रम में विविधता जोड़ी। खड़िया विद्यार्थियों ने पारंपरिक तरीके से अतिथियों का स्वागत किया, जबकि भाषा विभाग की ओर से जावा फूल भेंट किए गए।

मंत्री ने कहा कि करम पर्व की पहचान सिर्फ एक धार्मिक आयोजन तक सीमित नहीं है। यह प्रकृति, पुरखों और मानव जीवन के बीच सदियों से चले आ रहे संबंध को अभिव्यक्त करता है। करम की डाल इसी संवाद का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज की संस्कृति को केवल नृत्य और गीत के नजरिए से देखने के बजाय उसके पीछे मौजूद पारंपरिक ज्ञान और जीवन पद्धति को समझना जरूरी है।

उन्होंने कहा कि आदिवासी समाज को केवल गरीबी या सरकारी योजनाओं के लाभार्थी के रूप में देखने की सोच बदलनी होगी। भाषा और संस्कृति के संरक्षण के जरिए इस समाज के पारंपरिक ज्ञान को देश-दुनिया तक पहुंचाया जा सकता है।

कुलपति सरोज शर्मा ने कहा कि प्रकृति और आदिवासी समाज का संबंध आज भी प्रासंगिक है। जब पंचतत्व प्रदूषण की चुनौती से जूझ रहे हैं, तब करम जैसे आयोजन प्रकृति के साथ मनुष्य के रिश्ते को समझने का अवसर देते हैं। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय पारंपरिक ज्ञान, भाषा और संस्कृति को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। मौके पर डॉ. हरि उरांव, डॉ. प्रेम मुर्मू, बिरेंद्र सोय, डॉ. बंदे उरांव और पद्मश्री मधु मंसूरी हसमुख समेत कई लोग मौजूद रहे।