| खबरसेल- ग्राउंड रिपोर्ट |
रामगढ़: अकूत खनिज संपदा से परिपूर्ण अपने झारखंड को क्या वाकई ‘विकास’ की जरूरत नहीं…औद्योगिक क्षेत्र पतरातू में ‘विकास’ के लिए क्या तनिक भी जगह नहीं… राज्य गठन के 26 वर्षों में क्यों ‘प्रवासी’ होना ही ‘विकास’ के हिस्से में आया… मृत्यु तो अकाट्य सत्य है पर क्यों परिवार से दूर दम तोड़ने की नौबत आई। राज्य के कथित रहनुमाओं और नौकरशाहों को इसका माकूल जवाब अब सार्वजनिक जरूर करना चाहिए।
रामगढ़ के किन्नी में एक मां की रह-रहकर उठती चित्कार अपने बेटे को पुकार रही है। पत्नी की पथराई आंखें शून्यता में पति को ढूंढ रही हैं। दो मासूम नौनिहाल स्तब्ध हैं। एक भाई पीड़ा में हौसला जुटाने की मशक्कत कर रहा है। घर-गांव छोड़ पलायन को विवश हुआ विकास कुमार लिंडा सब पीछे छोड़ गया है। रोजी-रोटी और परिवार के बेहतर भविष्य की तलाश में चेन्नई गया मजदूर विकास किसी वाहन की चपेट में आकर दम तोड़ गया है। बीते शुक्रवार को हुए हादसे के बाद से शोकाकुल परिजन पार्थिव शरीर गांव लाए जाने के इंतजार में बैठे रहे। रविवार की रात तकरीबन 9.00 बजे पार्थिव शरीर पहुंचते ही माहौल बेहद गमगीन हो गया। आज सोमवार को अंतिम संस्कार होगा। वोट मांगने के लिए गलियों की ख़ाक छानते फिरते नेता-कार्यकर्ता और समाज के अगुवा-हितैषी मामले की जानकारी के बावजूद अभी तक सांत्वना देने भी नहीं पहुंच सके हैं। इधर, बड़ी विडंबना यह है कि विकास की पत्नी चांदनी पर तकदीर की बड़ी मार पड़ी है। उनके दोनों बच्चों को गंभीर अनुवांशिक बिमारी है, आर्थिक तंगी है और आगे जीवन बचाने तक की जद्दोजहद बड़ी है।

दोनों बच्चे हैं थैलीसीमिया के मरीज, इलाज लगभग नामुमकिन
नियती ने परिवार से सिर्फ विकास को नहीं छीना है, बल्कि दो मासूमों के जीवन की डोर को बुरी तरह से झिंझोड़ दिया है। मृतक विकास और उसकी पत्नी चांदनी के दो बच्चे हैं। पुत्र आदर्श (15 वर्ष) और पुत्री अमिता (11वर्ष) दोनों थैलीसीमिया बिमारी से ग्रसित हैं। दोनों बच्चों को लगभग हर माह रक्त चढ़ाने ( ब्लड ट्रांसफ्यूजन) की जरूरत पड़ती है और अन्य दवाएं भी दी जाती हैं। अमूमन पांच से सात हजार रुपए का खर्च हर बार पड़ता है। थोड़े देर-सवेर से बच्चों का स्वास्थ्य बिगड़ने लगता है। बच्चों का शारीरिक विकास सही रूप से उम्र के अनुरूप नहीं हो रहा है। आदर्श मैट्रिक की परीक्षा पास कर गांव के ही स्कूल में 11वीं की पढ़ाई कर रहा है। जबकि नमिता भी सातवीं कक्षा में पढ़ाई कर रही है। कुछ वर्ष में बच्चे बालिग भले हो जाएं पर स्वास्थ्य संबंधी परेशानी जीवन के हर मोड़ पर चुनौती बनी खड़ी करेंगी।

चांदनी की राह होगी बेहद कठिन, हौसले के सिवा पास कुछ भी नहीं
ग्रामीण बताते हैं कि बीते शुक्रवार की रात चांदनी को पति की मौत की जानकारी मिली। दुख और वेदना में घिरी चांदनी ने किसी तरह शनिवार को रांची सदर अस्पताल ले जाकर दोनों बच्चों को रक्त चढ़वाया है। रविवार को बच्चों को लेकर घर पहुंची चांदनी शून्य में खोई दिखी। वह खुद को समेट रही है। आज वह फिर उठेगी और पत्नी का धर्म भी निभाएगी। धन्य है यह झारखंड की माटी जहां की माताओं-बहनों के संयम और उनके धैर्य की ऊष्मा में सूर्य भी शीतल प्रतीत होता है।
भाई के कांधे पर परिवार के जीविकोपार्जन का बोझ
मृतक विकास के शादीशुदा छोटे भाई कृष्णा पर अब परिवार के भरण-पोषण का बोझ है। कृष्णा से पूछे जाने पर उसने बताया कि बड़े भाई विकास का विवाह 2009 में हुआ था और 2011 से ही वे काम करने बाहर चले गए। बीते सोमवार वे चेन्नई गए थे। जहां कंस्ट्रक्शन के नए काम में ज्वाइन करने जा रहे थे कि दुर्घटना में जान चली गई। एक वर्ष पहले पिता की भी मौत हो गई थी। कृष्णा ने बताया कि थोड़ी बहुत खेती-बाड़ी है, बस वही अब जीविकोपार्जन का आधार है।
क्या कहते हैं ग्रामीण
ग्रामीण कहते हैं कि परिवार बड़ी कठिनाईयों से जूझ रहा है। विकास की मौत से आगे मुश्किलें काफी बढ़ जाएंगी। परिवार के जीविकोपार्जन के साथ दोनों बच्चे आदर्श और नमिता का नियमित उपचार जरूरी भी है। सरकार और प्रशासन कुछ ठोस और सार्थक पहल करें। चांदनी को अनुकंपा पर नौकरी मिले और बच्चों के नियमित उपचार की व्यवस्था हो।
